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सम्पादकीय

मुसीबत में फँसे लोग सोशल मीडिया पर लोग कोस रहे सरकार को। जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा … चुनावों के समय वोट के लिए फोन कर-कर लोगों को उत्तराखण्ड बुलाने और पूरा खर्चा तक दे देने वाले उत्तराखण्ड के नेताओं ने आज मुसीबत में लोगों को भूखे मरने के लिए छोड़ दिया है। साहब, जो इन्सान बिना पैसों के, बिना रोजगार के परदेस में फँसा हो उसका दर्द केवल वो ही समझ सकता है।

मुसीबत में फँसे लोग सोशल मीडिया पर लोग कोस रहे सरकार को।

जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा … चुनावों के समय वोट के लिए फोन कर-कर लोगों को उत्तराखण्ड बुलाने और पूरा खर्चा तक दे देने वाले उत्तराखण्ड के नेताओं ने आज मुसीबत में लोगों को भूखे मरने के लिए छोड़ दिया है।

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साहब, जो इन्सान बिना पैसों के, बिना रोजगार के परदेस में फँसा हो उसका दर्द केवल वो ही समझ सकता है।

उत्तराखण्ड सरकार द्वारा प्रवासी उत्तराखण्डियों को वापस लाने और फिर मुकर जाने पर लोगों का गुस्सा सरकार के प्रति सोशल मीडिया पर उतर रहा है। आज सुबह जैसे ही ये समाचार वायरल हुआ कि सरकार केवल राहत कैम्पों और रास्तों पर फँसे लोगों को ही लेकर आयेगी। लोग आग बबूला होकर सोशल मीडिया पर सरकार के विरूद्ध तरह तरह के कमेंट करने लगे।

सरकार ने पहले तो जो लिंक जारी किया वो सही से काम नहीं कर रहा था। फिर भी जैसे-तैसे लोगों ने घण्टों की मेहनत के बाद उसमें रजिस्ट्रेशन करवा ही लिया। इसके साथ ही सरकार द्वारा जारी हेल्पलाइन नम्बरों के काम ना करने के कारण भी लोगों में सरकार के प्रति भारी रोष था। फिर भी आम उत्तराखण्डी ये उम्मीद लगाये बैठा था कि आज नहीं तो कल उत्तराखण्ड सरकार उसे अपने घर पहुँचा ही देगी। लेकिन आज आये इस बयान के बाद मुसिबतों में पहले से फंसे आम आदमी की सहन शक्ति भी जवाब दे गई

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दरअसल, जहाँ एक ओर प्रदेश की दूसरी सरकारें पहले से अपने लोगों को वापस लाने के लिए प्रयासरत हो गई थी, वहीं उत्तराखण्ड सरकार ने इस ओर बहुत देरी से रूची दिखाई। उसके बाद भी सरकार के प्रयास बहुत अधिक ठोस नहीं थे। सरकार केवल खानापूर्ती करते दिखाई दे रही थी। पूरी कहानी में इस देरी और अरूचि का नतीजा केन्द्र के आदेश के बाद आज सुबह लोगो के सामने आ गया।

चुनावों के समय वोट के लिए फोन कर-कर लोगों को उत्तराखण्ड बुलाने और पूरा खर्चा तक दे देने वाले उत्तराखण्ड के नेताओं ने आज मुसीबत में लोगों को भूखे मरने के लिए छोड़ दिया है।

साहब, जो इन्सान बिना पैसों के, बिना रोजगार के परदेस में फँसा हो उसका दर्द केवल वो ही समझ सकता है। जिसका पेट भरा हो उसे तो नियम कायदे ही समझ में आते हैं। मंत्री-मुख्यमंत्री तो कोई भी बन सकता है, लेकिन ऐसा जन नेता जिसे लोग सालों तक याद रखें उसके लिए जनता के दर्द को समझना जरूरी होता है।

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